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पानीपत मूवी रिव्यू: दिलचस्प विषय पर कमजोर फिल्म | नयी बॉलीवुड खबरे & Gossip

पानीपत मूवी रिव्यू: दिलचस्प विषय पर कमजोर फिल्म

By - अनुप्रिया वर्मा

DECEMBER 06,2019

पानीपत
आशुतोष गोवारिकर पीरियड फिल्में बनाने में माहिर हैं। यहीं वज़ह है कि वह जब कोई फिल्म लेकर आते हैं तो पूरी उम्मीद होती है कि कहानी में बात होगी। हालांकि मोहनजोदड़ो से उन्होंने निराश किया था। इस बार वह पानीपत लेकर आए हैं। हिंदी सिनेमा में लगातार इन दिनों पीरियड फिल्में बन रही हैं। गौर करें तो मराठा गाथा पर ही हाल में कई फिल्में आई हैं। ऐसे में अब हिंदी फिल्मों के निर्देशक को थोड़ा सचेत होना पड़ेगा, चूंकि कहानियां कहने के तरीके में अगर वह नयापन नहीं ला पाएंगे तो सारी फिल्में एक जैसी लगने लगेंगी। दर्शकों को। आने वाले समय में अजय देवगन की तानाजी के सामने निश्चित तौर पर यह चुनौती आने वाली है। चूंकि आशुतोष ने पानीपत में काफी हद तक मराठा के शौर्य गाथा का गुणगान कर दिया है।

आशुतोष ने पानीपत के रूप में रोचक कहानी चुनी। लेकिन फिल्म के ट्रीटमेंट को उन्होंने रोचक तरीके से प्रस्तुत करने में कौताही की है। यही वजह है कि अच्छी कहानी होने का बावजूद फिल्म एंगेज करके रख पाने में सफल नहीं हुई है। उसपर से बेवजह की फिल्म की लंबाई बढ़ा कर निर्देशक दर्शकों को और अधिक तकलीफ देते हैं। तीन घंटे की कहानी और वह भी पीरियड ड्रामा के रूप में देखना, इतना  धैर्य हिंदी सिनेमा के दर्शकों के पास कहां है।
हालांकि आशुतोष अपने किरदारों के साथ पूरी तरह से न्याय करने वाले माने जाते हैं। यह उनकी खूबी है कि वह बेवजह का अपने किरदारों को मेलो ड्रामेटिक या बेवजह लार्जर देन लाइफ, भारी कॉस्टयूम, या भारी मेकअप वगरेह थोपने की कोशिश नहीं करते। लेकिन अगर वहीं समझ उन्होंने फिल्म की कहानी को लेकर भी दिखाई होती तो पानीपत एक शानदार फिल्म होती। लेकिन उसमें वह पूरी तरह से चूके हैं। एक बात यह भी नहीं समझ आई है कि क्यों आशुतोष जैसे निर्देशक को हद से अधिक सिनेमेटिक लिबर्टी लेने की जरूरत पड़ी है। फिल्म में ऐसे कई वाकया हैं, जिन पर विश्वास कर पाना मुश्किल है।

पीरियड फिल्मों के किरदारों को दिखाते वक्त यह भी निर्देशक की एक अहम जिम्मेदारी हो जाती है कि वह उस व्यक्तित्व के कुछ खास पहलू से रूबरू कराए, जो कि जेहन में याद रह जाए। आशुतोष यहां चूके हैं। हद से अधिक कलाकार और किरदारों को शामिल करने की वजह से सदाशिव जो कि सेंट्रल किरदार हैं, उनका कोई खास व्यक्तित्व सामने नहीं आ पाता है। यहीं नहीं घटनाएं भी एक साथ इतनी दिखाई गई हैं कि उलझन होना लाजिमी है। वहीं पेशवा युद्ध पर जाते हैं और मस्तानी लेकर आते हैं, ऐसा कटाक्ष करना बाजीराव और मस्तानी पर बचकाना लगता है। 

बहरहाल,फिल्म की कहानी पार्वती( कृति) के नैरेशन से शुरू होती है, जिसमें वह अपनी पानीपत की लड़ाई की आंखों देखी बयान करती है। पानीपत मराठा साम्राज्य के प्रमुख सेनापति रहे सदाशिव की वीर गाथा है, जिसे ऐतिहासिक पानीपत की लड़ाई के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है। फिल्म की कहानी सदाशिव( अर्जुन) के पुणे लौटकर उदगीर फोर्ट से विजय होकर लौटने की कहानी से शुरू होती है। लेकिन लौटने के बाद नाना साहब की पत्नी ईर्ष्या की वजह से सदाशिव को युद्ध पर ना जाने के लिए तरकीब रचती है और सदाशिव को धनमंत्री बनना पड़ता है। पार्वती( कृति) बचपन से ही सदाशिव से प्यार करती है। सदाशिव उसे समझाता है कि उसकी जिंदगी में देश से बढ़ के कुछ नहीं। लेकिन वह सदाशिव से शादी किए बिना नहीं मानती है। दोनों विवाह बंधन में बांधते हैं। तभी युद्ध का बिगुल बज ता है कि उत्तर समस्या में है। मुगल साम्राज्य से उसको बचाना होगा। सदाशिव कम सेना में भी हिम्मत से यह काम करने का जिम्मा उठाता है। अब्दाली नाम मुगल क्रूर शासक के खिलाफ वह युद्ध लड़ता है अपने मरते दम तक। पार्वती उसका साथ देती है। पैसों से कैसे पूरी राजनीति बदली जाती है, कब कौन किसको धोखा देता है, इस राजनैतिक प्रपंच के बीच सदाशिव अपने ही धोखा देने वाले राजाओं के कारण हारता है और वीर हो जाता है।

ऐतिहासिक विषयों में रूचि रखने वालों के लिए यह एक दिलचस्प फिल्म है। आशुतोष ने इसे रियल अप्रोच के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश भी की है। लेकिन फिर भी कहानी बांधे नहीं रख पाती। हालांकि एक्शन दृश्यों को खूबसूरती से फिल्माया गया है। लेकिन कुछ दृश्यों में भंसाली की छाप नजर आती है, जिससे यह फिल्म देखी देखी सी लगती है। दुख इस बात का भी है कि वार फिल्म होने के बावजूद वार अधिक दृश्यों में नहीं हैं। आशुतोष ने मुख्य बात पर आते आते, भूमिका दृश्यों में बेवजह के दृश्यों में वक्त की काफी बर्बादी की है।

अर्जुन कपूर के लिए यह पहला मौका था जब वह ऐसे किरदार में नजर आए हैं। लेकिन उन्होंने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की है। हालांकि कुछ दृश्यों में वह बेहद थके नजर आए हैं। कृति ने चौंकाया हैं। उन्होंने पार्वती के किरदार को अच्छी तरह से जिया है। उसके साथ न्याय किया है। आगे फिल्मों में वह और निखरेंगी। अफ़सोस है कि संजय दत्त जैसे कलाकार को इतने बेहतरीन किरदार देने के बावजूद उनसे आmशुतोष ने काम ही नहीं लिया है। वह सिर्फ संवाद बोलते ही नजर आते हैं। जबकि उम्मीद थी कि अर्जुन और उनके बीच फाइटिंग दृश्य होंगे।  पेशे से आरजे मंत्रा ने कमाल का काम किया है। एक क्रूर और मतलबपरस्त बिचौलिए के रूप में उन्होंने खूब उम्दा अभिनय किया है। मोहनीश के पास भी करने को कुछ नहीं था। कुल मिलाकर कहा जाए तो यह आशुतोष की दिलचस्प विषय पर बनी कमजोर फिल्म है।

दिलचस्प विषय पर कमजोर फिल्म
फिल्म : पानीपत
कलाकार: अर्जुन कपूर, कृति सैनन, संजय दत्त, मंत्रा, मोहनीश बहल
निर्देशक : आशुतोष गवारिकर
रेटिंग : तीन स्टार (३)

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर - 

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