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सुपर 30 मूवी रिव्यू: ‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा’ को चरितार्थ करती है फिल्म | नयी बॉलीवुड खबरे & Gossip

सुपर 30 मूवी रिव्यू: ‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा’ को चरितार्थ करती है फिल्म

By - टीम रेडियो सिटी

JULY 11,2019

सुपर 30 मूवी रिव्यू, सुपर 30, रितिक रोशन, मृणाल ठाकुर, ऋतिक रोशन
बिहार के सुपर 30 फेम गणितज्ञ पर बनी हैं फिल्म सुपर 30। आनंद कुमार की बायोपिक है। आनंद कुमार, वह शख्स हैं, जिन्होंने ऐसे दौर में जब उन्हें गणित के क्लासेज की कोचिंग देने के लिए लाखों रुपये दिये जा रहे थे, उन्होंने सब छोड़ कर निर्णय लिया कि वे गरीब बच्चों को आइआइटी की तैयारी करवायेंगे। वह बच्चे कचड़ा उठाने वाले का बच्चा हो सकता है, मैला साफ करने वाला, माल ढोने वाला बच्चा हो सकता है। चूंकि आनंद कुमार का मानना था कि शिक्षा पर सबका बराबरी का अधिकार है. फिल्म का पूरा सार भी इसी बात पर टिका है कि अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, जो हकदार है, वही बनेगा। इस बात को चरितार्थ तो करती है फिल्म। निस्संदेह एक नेक सोच के साथ फिल्म का निर्माण किया गया है। सुपर 30 की शुरुआत और उसकी सफलता की कहानी और आनंद कुमार का नाम न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाई गयी है। उनका लोहा माना गया है। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि तो ही नहीं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आनंद कुमार के 30 गरीब बच्चे लगातार आईआईटी की परीक्षाओं में पास होते रहे हैं। यह प्रेरणा स्त्रोत तो है ही, उन पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है। फिल्म देखने के बाद एक बार उसे भी जरूर देखा जाना चाहिए। 

बहरहाल, फिल्म पर आते हैं। सुपर 30 के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में कोचिंग के माध्यम से हो रही धांधली और एजुकेशन माफिया के व्यापार पर भी प्रकाश डाला गया है। कहानी आनंद कुमार के नजरिये से दिखाई गयी है, लेकिन उनके संघर्ष के साथ-साथ उस दौर के उस ढांचे की भी दिखाई गयी है, जहां बड़े से बड़े पॉलिटिशन भी एजुकेशन को मंडी मान कर, लगातार पैसे कमा रहे हैं। पृष्ठभूमि बिहार है। बिहार का पटना शहर। जहां लोगों की जनसंख्या से अधिक बैनर कोचिंग सेंटर्स के लगे होते हैं। देश की बड़ी से बड़ी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने की लालच देकर, नामचीन और अमीरों को झांसे में लेकर पैसे ऐंठने का कारोबार भी पटना जैसे शहरों में लंबे अरसे से हो रहा है। विकास बहल की फिल्म उस तरफ भी झांकती है। मीडिया, शिक्षा, माफ़िया और राजनीति कैसे एक दूसरे से कनेक्टेड हैं और इस कारोबार को प्रभावित करते हैं। यह भी फिल्म का जरूरी हिस्सा है।

फिल्म की शुरुआत आनंद कुमार के संघर्ष से शुरू होती है। उन्हीं के एक छात्र फुग्गा, जो कि सेक्योरिटी का काम किया करता था। बाद में वह विदेशों में नाम कर गया। पूरी कहानी सुनाता है। आनंद कुमार गणित में जीनियस थे, उन्होंने वह प्रॉब्लम भी सॉल्व कर दिया था, जो कि बड़े-बड़े गणितज्ञ नहीं कर पाये थे। कैंब्रिज से उसको बुलावा भी आता है। मगर आर्थिक स्थिति बुरी होने के कारण वह पढ़ने नहीं जा पाता। बाद में पिता की मौत के बाद पापड़ बेचने की नौबत आती है। लेकिन इसी बीच ललन उसका हाथ थामता है और गणितत्र आनंद कारोबारी बन जाता है। लेकिन फिर अचानक उसे आत्मज्ञान होता है और वह ठान लेता है कि सबकुछ छोड़ कर गरीबों के बच्चों को पढ़ायेंगे। गणित पढ़ाने का आनंद के अपने ट्रिक्स हैं। सुपर 30 के इन बच्चों को आईआईटी में दाखिला दिखाने तक के क्रम में आनंद को काफी कुछ झेलना पड़ता है। जानलेवा हमला भी होता है उनपर, लेकिन बच्चे अपने शिक्षक को कैसे बचाते हैं और फिर उनका सपना पूरा करते हैं। यही फिल्म की कहानी है।

फिल्म में महाभारत के एकलव्य और द्रोणाचार्य के अर्जुन और एकलव्य के पक्षपात का उदाहरण लिया गया है, जो कि फिल्म की कहानी के अनुसार बिल्कुल सटीक बैठता है। पैसों के लालच में कारोबारी बने आनंद को शिक्षक बनाने में यही उदाहरण काम करता है, लेकिन फिल्म में ऐसी कुछ खामियां हैं जो एक बेहतरीन विषय को औसत कहानी बना देती है। सबसे पहले तो नायक की बात करें तो, ऋतिक रौशन ने जो बिहारी लहजा पकड़ा है, वह दरअसल पूरी तरह जंचा नहीं है। वजह यह भी है कि यह बॉलीवुड का ट्रेंड बन गया है कि जब भी बिहारी या भोजपुरी की बात होती है तो हम को हमरा और क्यों को काहे जैसे शब्दों के अंदर ही टाइपकास्ट कर दिया गया है। ज्यादा वास्तविक दिखाने के चक्कर में यह ओवर लगने लगते हैं। सच तो यह है कि आनंद कुमार के इंटरव्यू ही देख लें। वैसे कौन बात करता है। पंकज त्रिपाठी को ही फिल्म में देख लें, आदित्य श्रीवास्तव जो लल्लन बने हैं। उन्हें देख लें, उन्होंने लहजे को बिल्कुल सटीक तरीके से पकड़ा है। ऋतिक वहां पूरी तरह से चूके हैं, लेकिन अभिनय के लिहाज से कुछ दृश्यों में वह भावुक कर जाते हैं। यह भी सच है कि ऐसे विषय जब बॉलीवुड के ए लिस्टर्स नायक करते हैं तो विषय चर्चा में अधिक आती है। वरना, शायद ही फिल्म चर्चित हो पाती। उस लिहाज से ऋतिक का चयन सही है। पंकज त्रिपाठी एक पॉलिटिशन के किरदार में खूब जमे हैं। लंबे समय के बाद बड़े परदे पर वापसी करने वाले आदित्य श्रीवास्तव की दमदार भूमिका है। नंदिश और साधना सिंह ने भी अपने हिस्से का अभिनय खूब निभाया है. मृणाल ठाकुर को जितने दृश्य मिले हैं. वह फिट बैठी हैं। अमित साध मीडिया रिपोर्टर के रूप में जमे हैं।

वहीं फिल्म की दूसरी बड़ी खामी है, फिल्म का अत्यधिक मेलोड्रामा। फिल्म के एक दृश्य में जिस तरह बच्चों ने अपने टीचर को बचाने के लिए बाहुबली का जो गणित वर्जन पेश किया है, वहीं फिल्म कमजोर पड़ जाती है। चूंकि जब हम शिक्षक और उनके बच्चों की कहानी देख रहे हैं तो फिल्म इमोशनल रूप से अधिक कनेक्ट की जानी चाहिए थी। बच्चों का यह फिल्म अवतार जरूरी नहीं था, हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में अंगरेजी और हिंदी की जो खाई है, उसे फिल्म में बखूबी उकेरा गया है, लेकिन फिल्म के साथ दिक्कत यही है न ही यह पूरी तरह इमोशनल कहानी रह जाती है न ही बहुत अधिक प्रेरणादायक कहानी। इस लिहाज से तारें जमीं पर बनी फिल्म जिस तरह लंबे समय तक आपको भावनात्मक रूप से छाप छोड़ जाती है। यह कहानी यादगार तो साबित नहीं होती है। साथ ही सफल बायोपिक में सिर्फ नायक के व्हाइट शेड्स ही दिखाने की परंपरा बॉलीवुड में रही है। सुपर 30 में भी वहीं दिखाया गया है, जबकि आनंद कुमार की जिंदगी को जो करीब से जानते हैं। उनके ग्रे शेड्स को भी परदे पर दिखाना चाहिए था, तब यह फिल्म सार्थक नजर आती।

निर्देशक विकास की यह निर्देशन की चूक है कि वह फिल्म के बिखराव को पूरी तरह से समेट नहीं पाये हैं। ऐसे में कई अहम मुद्दे छूटे हैं और कई बेवजह के मुद्दे सामने हैं। इन तमाम बातों के बावजूद आनंद कुमार ने जो कदम उठाये थे, हां उस नेक काम के लिए एक फिल्म के हकदार तो वह थे ही। विषय के लिहाज से एक बार फिल्म जरूर देखा जाना चाहिए।

समीक्षक : अनुप्रिया वर्मा
फिल्म का नाम सुपर 30
कलाकार : ऋतिक रोशन, मृणाल ठाकुर, आदित्य श्रीवास्तव, पंकज त्रिपाठी, वीरेंद्र अस्थाना, साधना सिंह, अमित साध, नंदिश संधू
निर्देशक  : विकास बहल
लेखक : संजीब दत्ता 

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर -

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