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पंगा मूवी रिव्यूः सुपर वुमन मांओं की असल बायोपिक है ‘पंगा’ | नयी बॉलीवुड खबरे & Gossip

पंगा मूवी रिव्यूः सुपर वुमन मांओं की असल बायोपिक है ‘पंगा’

By - अनुप्रिया वर्मा

JANUARY 24,2020

अश्विनी अय्यर तिवारी, पंगा मूवी रिव्यू, कंगना रनौत, जस्सी गिल, ऋचा चड्डा, नीना गुप्ता
ट्रेलर देख कर अगर आपने यह अनुमान लगाया है कि पंगा कबड्डी पर बनी कोई स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म या बायोपिक फिल्म है, तो आपका अनुमान गलत है। चूंकि  यह फिल्म दरअसल, उन हर मांओं की बायोपिक है, जिन्होंने अपने परिवार के लिए अपने सपनों के साथ समझौते करने में कभी हिचक नहीं की। उन सभी मांओं को यह फिल्म ट्रिब्यूट देती है, जिनके बारे में अक्सर उनके नकचढ़े और एहसान फ़राहमोश बच्चों को शिकायत होती है कि माएं घर में रह कर करती ही क्या हैं। उनकी क्या भूमिका है। मेरी मां और मेरी सास दो महिलाएं जो मेरे परिवार से हैं, इन दोनों को ही अपने परिवार के कारण और बच्चों के पालन पोषण के लिए अपनी -अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी, मेरी सास के दिल में अब भी इस बात की टीस है कि अगर उन्होंने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी होती तो नजारा कुछ और होता। वह जिस ( आँगनबाड़ी )फील्ड से जुड़ी थीं, वहां महिलाओं से बातचीत कर काम किया जाता था। आज भी हमारे परिवार में उनकी तरह कम्युनिकेशन और स्नेह-संपर्क बनाने की कला में दूसरा कोई सानी नहीं। लेकिन फिर भी वह अपने पैशन के साथ राब्ता नहीं रख पायीं। उनकी तरह ही हमारे आस-पास ऐसी कई महिलाओं की कहानी घूमती हैं, जो अपने परिवार के लिए लगातार सम्पर्ण करती रहती हैं। खुद तापसी पन्नू बताती हैं कि  उनकी मां के कई सपने थे जो पूरे नहीं हो पाए, जिन्हें वह अब बेटियों के माध्यम से पूरी करती हैं। इन सभी महिलाओं का जिक्र आज इसलिए क्योंकि अश्विनी ने उन्हीं महिलाओं की कहानी जया  निगम के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाई है। उन सभी महिलाओं को यह फिल्म सेल्यूट कर रही है। 

अश्विनी की बात दिल को छूती है। जया जो कि कबड्डी की चैम्पियन रही है। इंडिया को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेप्रेज़ेंट कर चुकी है, अपने सपने को छोड़ देती है। चूंकि जब वह मां बनती है तो उसका बेटा एक प्री मेच्योर बच्चा होता है और डॉक्टर की सलाह है कि बच्चा कमजोर है, सो उसका ध्यान रखना होगा। जया रेलवे की सामान्य सी नौकरी करने लगती है। लेकिन खुद को कबड्डी से दूर नहीं रख पाती है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब एक दिन अपने बेटे के स्कूल में शामिल न हो पाने का कारणबेटा मां से सवाल करता है कि आप करती ही क्या हो, आपका काम इम्पोर्टेन्ट नहीं, टिकट ही तो कट करती हो, यह ना काबिल सवाल अमूमन मांओं से पूछे जाते हैं। ऐसे में बेटे को उसके पापा (जस्सी गिल) बताते हैं कि  उसकी मम्मी क्या थी। बेटा ठान लेता है कि वह मां को दोबारा कबड्डी खेलने के लिए प्रेरित करेगा। लेकिन जया जानती है कि कथनी और करनी करना एक मां के लिए कितना कठिन होगा। वह पिता को समझाती है कि यह संभव नहीं। मजाक-मजाक में वह बेटे की बात रखने के लिए कबड्डी की दोबारा प्रैक्टिस शुरू करती है। लेकिन फिर वह उसे हकीकत में जीना चाहती है। ऐसे में उसकी दोबारा वापसी, कबड्डी की नयी पीढ़ी के बीच जगह बनाना, पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों से पंगा लेते हुए कैसे जया अपना सपना पूरा करती है और इसमें उसके साथी, पति और बेटे की क्या भूमिका रहती है। यह देखना फिल्म में बेहद दिलचस्प है। 

अश्विनी की इस फिल्म की रोचक बात यह है कि फिल्म बेहद सामान्य परिवार को बेहद सामान्य  परिवार ही दिखाती है। वह कुछ भी हीरोइक करने की कोशिश नहीं करती कि जया की वापसी हुई है तो, वह एक डीएम कबड्डी में धुरंधर बन गई है, बल्कि जया इतने दस सालों बाद जब लौटती है तो उसे शारीरिक रूप से क्या-क्या परेशानी आती है। उन सबके बीच वह कबड्डी के मैदान में पहुंचती है, इसे बहुत स्वाभाविक तरीके से दर्शाया है।ऐसा नहीं है कि अचानक कंगना वापस आकर बाहुबली बन जाती है। लेकिन अपने अनुभव और स्किल से वह किस तरह दोबारा खेलती है, यह देखना बेहद दिलचस्प है। यही इस फिल्म की खूबी है कि फिल्म की पृष्ठभूमि, कलाकार, संवाद अदायगी एकदम स्वाभाविक है। नील बट्टे सन्नाटा, और बरेली की बर्फी के बाद छोटे शहर की नब्ज को बखूबी दिखाया है अश्विनी ने। 

मेरा मानना है कि कंगना ने बेहतरीन अदाकारी की तरफ एक बार फिर से कमबैक किया है। ठीक वैसा ही जैसा फिल्म में उनकी किरदार कमबैक करती है। क्वीन के बाद तनु वेड्स मनु को छोड़ दें तो कंगना की फिल्में नाकामयाब रही हैं, शायद दर्शक उनसे कनेक्ट नहीं कर पा रहे थे। खुद कंगना यह बात ईमानदारी से स्वीकारेंगी कि लम्बे अरसे के बाद सबके बीच वाली कंगना की वापसी हुई है। सहज तरीके से उन्होंने जिस बारीकी से अपने किरदार को जीवंत किया है। यह फिल्म लम्बे अरसे  तक याद रखी जाएगी। एक दिलचस्प किरदार मीनू (ऋचा चड्डा) के रूप में इस फिल्म में सबका बेहद मनोरंजन करती है। जया यानी कंगना फिल्म की शान हैं, तो ऋचा फिल्म में जान फूंकती है। मीनू के रूप में वह एक कोच, और जया की साथी के किरदार में खूब जमी हैं। उन्हें बेहतरीन कॉमेडी पंचेज दिए गए हैं। और ऋचा ने उसे बखूबी निभाया है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अच्छी कॉमेडी करने वाली एक्ट्रेस की कमी है, ऐसे में ऋचा के माध्यम से वह पूर्ति होती दिख रही है। जस्सी गिल इससे पहले जिन फिल्मों में भी नजर आये हैं। इतने सहज नहीं लगे हैं। इस बार वह भी प्रभावित करते हैं। बाल कलाकार यज्ञ ने कमाल अभिनय किया है। उन्हें अब और भी मौके मिलेंगे। नीना औरर राजेश को जितने भी दृश्य मिले हैं, उन्होंने बखूबी निभाया है। 

अश्विनी के निर्देशन की एक बात गौरतलब है कि अश्विनी अपनी फिल्मों की नायिकाओं के साथ अलग ही डाइमेंशन देती हैं। नील बट्टे से लेकर बरैली की बर्फी, और इस फिल्म में जया और मीनू समाज की वास्तविक महिलाओं के बीच की किरदार लगती हैं। इस फिल्म को देखने के बाद आपको एक बार अपनी मां को गले लगाकर उन्हें सॉरी जरूर कहना चाहिए, क्योंकि यह फिल्म आपको जवाब देती है कि मां बाप आपके लिए करते क्या हैं। यह फिल्म आज के दौर की ईमानदार फिल्मों में से एक है। 

फिल्म : पंगा
कलाकार: कंगना रनौत, जस्सी गिल, ऋचा चड्डा, नीना गुप्ता, यज्ञ भसीन 
निर्देशक : अश्विनी अय्यर तिवारी 
रेटिंग : 4.5 स्टार

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर - 

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