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ड्रीम गर्ल मूवी रिव्यूः सोशल मीडिया की स्वप्नीली दुनिया पर एक दिलचस्प कटाक्ष | नयी बॉलीवुड खबरे & Gossip

ड्रीम गर्ल मूवी रिव्यूः सोशल मीडिया की स्वप्नीली दुनिया पर एक दिलचस्प कटाक्ष

By - टीम रेडियो सिटी

SEPTEMBER 13,2019

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आयुष्मान खुराना ने अपनी फिल्म विक्की डोनर के वक़्त से ही ऐसी फिल्मों का चयन शुरू किया, जो वाकई में ऐसे विषय होते हैं, जिन्हें निभाने में कई कलाकार संकोच कर सकते हैं और करते भी हैं। आयुष्मान की वहीं यूएसपी बन चुकी है कि वह ऐसे ही संकोचित माने जाने वाले विषय पर डंके की चोट के साथ काम करते हैं। आश्चर्यजनक बात है कि उनके ये सारे एक्सपेरिमेंट कामयाब भी हुए हैं। एक बार फिर से उन्होंने अपनी नयी फिल्म ड्रीम गर्ल में एक ऐसे ही विषय को चुना है। वह फिल्म में एक ऐसे किरदार में हैं, जो लड़कियों की आवाज़ निकाल कर कॉल सेंटर में काम करते हैं और ऐसे लोगों का मनोरंजन करते हैं, जो या तो ऐसे दोस्ती वाले कॉल सेंटर के रेगुलर ग्राहक इसलिए हैं, क्योंकि वह अकेले हैं और उनकी बातें शेयर करने वाला कोई नहीं, या फिर अपनी मौज मस्ती के लिए। ड्रीम गर्ल इस सोच के साथ बनाई गई एक सार्थक फिल्म है कि सोशल मीडिया में हमने इस कदर अनजान लोगों को अपनी जिंदगी में इनस्टॉल कर लिया है कि हमारे साथ के लोगों से राब्ता टूटने का हमें अफ़सोस नहीं हैं। इन दिनों या तो हम लोगों को ट्रोल कर रहे हैं, या सोशल मीडिया पर जिंदगी ट्रोल कर रहे हैं। ऐसे में फिल्म के एक दृश्य में एक युवा टोटो पूजा से फोन पर मनचली बातें करने के लिए बेचैन है, लेकिन वहीं उसकी मां का फोन आता है तो उसके पास वक़्त नहीं होता है। 

फिल्म एक नेक सोच के साथ बनी है कि सोशल मीडिया में लाखों दोस्त बनाने के बावजूद हर व्यक्ति क्यों अकेला है और उसे बस एक ऐसे किसी का साथ चाहिए, जो उसकी बात सुन सकें। लेकिन परेशानी यह है कि उस इंसान की तलाश हम हमेशा एक अजनबी में ही करते हैं। परिवार के लोगों के साथ नहीं कर पाते हैं। चूंकि वहां अपनों द्वारा जजमेंटल होने का डर बना रहता है। ऐसे ही अकेले लोगों की वजह से पूजा जैसी लड़कियों की डिमांड बढ़ती है। फिल्म में यह ऐंगल में दिलचस्प है कि  पुरुषों को घर पर अपनी बीवी हमेशा नीम की तरह कड़वी लगती है, लेकिन बाहर वाली पूजा हर पुरुष की ड्रीम गर्ल होती है। उसकी चाहत सभी की है। फिल्म का शीर्षक सटीक है। जिस तरह इन मनचले पुरुषों का सपना और भ्र्म टूट कर चूर होता है, वह उन सभी पुरुषों की गाथा है, जिन्हें कुछ नया स्वाद चखने की जिज्ञासा रहती है और इसके लिए वह फ्रेंडशिप वाले कॉल सेंटर्स के रेगुलर ग्राहक बन जाते हैं। पुरुषों की उस मानसिकता को खूबसूरती से परोसती है फिल्म। 

राज शांडिल्य की इस फिल्म की हीरो पूजा (आयुष्मान खुराना) ही हैं, दरअसल कहानी करम (आयुष्मान खुराना) नामक एक लड़के की है, जिसे अपने घर का लोन चुकाना होता है और चूंकि  बचपन से उसे यह गॉड गिफ्टेड चीज मिली है कि वह लड़का होकर भी लड़की की आवाज बखूबी निकाल सकता है। यही वजह है कि मोहल्ले में हर साल उसे कभी राधा तो कभी द्रोपदी तो कभी सीता बना देते हैं। वह इसी बात का फायदा उठा कर अपनी आवाज़ लड़की में तब्दील करता है और देखते-देखते अपने पापा के सिर से सारा लोन चुका  देता है। दिक्क्त मगर तब आती है, जब पूजा से टेलीफोन पर बात करने वाले सारे लड़के, उसके आशिक बन जाते हैं और उससे शादी करने की हठ ठान बैठते हैं। और तो और करम के पिता भी पूजा के पीछे लट्टू हो जाते हैं। जिनमें एक शायर कांस्टेबल, एक ब्रह्मचारी, एक युवा मजनू और एक मैगजीन में काम करने वाली जर्नलिस्ट शामिल होती है। जबकि करम उर्फ़ पूजा खुद एक लड़की से प्यार करता है, जिसका नाम माही (नुसरत) है। कहानी में दिलचस्प ट्विस्ट तब आता है, जब करम के पिता भी पूजा से शादी करने की जिद्द ठान लेते हैं। किस तरह पूजा अपने ही रचाये टेलफ़ोनिक स्वयंवर से बाहर निकलती है और सब तक हकीकत बयां  करती है।  यह देखना दिलचस्प है। 

कहानी मथुरा की पृष्ठभूमि पर आधारित है। राज की यह पहली फिल्म है। लेकिन वह टेलीविजन के लिए लम्बे समय से राइटिंग कर रहे हैं। उन्होंने कॉमेडी सर्कस, कॉमेडी नाइट विद कपिल और कई फिल्मों के लिए संवाद लेखन भी किये हैं। हास्य से भरपूर वन लाइनर पर उनकी तगड़ी कमांड है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यही वजह है कि  इस फिल्म में भी उन्होंने जबरदस्त हास्य के वन लाइनर डाले हैं। कई वन लाइनर महंगाई, बेरोजगारी पर कटाक्ष भी है। लेकिन सबसे दिलचस्प महाभारत की द्रोपदी वाला संदर्भ है, जिसमें वह मजाक- मजाक में बात कह जाते हैं कि जिस तरह द्रोपदी की इज्जत को पांडवों और कौरवों ने जुए के लिए दांव पर लगा दिया था। वह सबसे बड़ा मी टू था। दरअसल, फिल्म में पूजा को द्रोपदी और उसके मजनुओं को पाडंवों के रूप में उदाहरण देना फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। 

साथ ही फिल्म के मुख्य कलाकार का नाम करम  और पूजा रखना भी दिलचस्प है कि क्या हुआ जो करम ने आवाज बदली और लड़का होकर लड़की बना। कर्म ही पूजा है।  इस सोच के साथ वह आगे बढ़ा। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म में इस बात को अंडर लाइन नहीं किया गया है। 

फिल्म की खूबी है कि फिल्म में एक साथ कई कहानियां चल रही हैं। एक तरफ करम की प्रेम कहानी है तो दूसरी तरफ अपने परिवार और नौकरी से त्रस्त कॉन्स्टेबल, वहीं एक युवा टोटो आज के युवाओं की छवि दिखाता है, जिसे हर इंस्टेंट चीजें आकर्षित करती है तो एक लड़की जो तीन बार लड़कों से धोखा खा चुकी है और अब उसे सिर्फ लड़कियों पर ही भरोसा है। इन सबके मर्ज की दवा पूजा बनती है। फिल्म की सोच अच्छी है कि हमें आस-पास के लोगों से किसी ऐसे इंसान की जरूरत है, जिससे हम मन की बात कर  सकें, जो हमें जज न करें। यह फिल्म सोशल मीडिया में हर वक़्त घुसे रहने वाले लोगों पर अच्छा कटाक्ष है। साथ ही उन्हें एक सबक भी है कि इसके चक्कर में वह कई बार ब्लंडर कर अपने ही रिश्तों में उलझ जाते हैं। एक अजनबी में अपना हमसफ़र ढूढ़ना और पल में उसे अपना बनाना कैसे घातक हो सकता है। यह फिल्म दर्शाती है। हम आये दिन ऐसी कई खबरें पढ़ते हैं, जिसमें ऑनलइन चैटिंग में यह सच सामने आता है कि पिता अपनी बेटी से माँ अपने बेटे से अश्लील बातें करते हैं अनजाने में, बाद में वह संकोचित होकर आत्महत्या तक कर बैठते हैं। कर्म और जगजीत के माध्यम से इसे अच्छी तरह फिल्म में दर्शाया गया है। 

आयुष्मान बेहतरीन कलाकार हैं, वह लगातार खुद को साबित भी कर रहे हैं। लेकिन ड्रीम गर्ल और बेहतरीन बन सकती थी। अगर निर्देशक सबकुछ परोसने के चक्कर में थोड़ी हड़बड़ी में न रहते। फिल्म की कमजोरी यह है कि फिल्म भावनात्मक रूप से आपको बहुत टच नहीं कर पाती है। चूँकि फिल्म में सिर्फ मजाक, मजाक और हास्य को ही भरने की कोशिश की गई है तो इमोशनल हिस्से पर अधिक काम नहीं किया गया है। फिल्म के क्लाइमेक्स में उम्मीद थी कि और गहराई दिखाई जाएगी, लेकिन बहुत ही जल्दबाजी में सबकुछ परोस देने के चक्कर में निर्देशक वहां चुके हैं। हास्य के साथ इमोशन का सही समावेश जिस तरह हमें हिरानी की फिल्मों में देखने को मिलता है , वह देखने की गुंजाइश यहां भी बन सकती थी। लेकिन वह कमी रह गई है। वहीं कुछ डबल मीनिंग संवादों से भी बचा जा सकता था। लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होआ कि निर्देशक राज अपनी पहल कोशिश में कामयाब रहे हैं। वह दर्शकों का मनोरंजन कर पाएंगे। लेकिन विषय ऐसा था कि कुछ पहलुओं पर ध्यान देते तो फिल्म यादगार बन सकती थी। हालाँकि खुद आयुष्मान ने भी अपनी बातचीत में ड्रीम गर्ल उनकी अब तक की सबसे कमर्शियल फिल्म होगी, शायद इसलिए उस लिहाज से इस फिल्म में कमर्शियल मसाला कूट -कूट कर भरा भी हुआ है।  

हिंदी सिनेमा में यह पहली बार नहीं है कि निर्देशकों ने पुरुषों को महिलाओं का वेश दिया है। फिल्मों के जनक माने जाने वाले दादा फाल्के  तो अपनी शुरुआती दौर की फिल्मों में लड़कों को लड़कियां बनाते रहे हैं। बाद के दौर में अमिताभ, शाहरुख़, सलमान, आमिर, अक्षय, गोविंदा, कमल कई कलाकारों ने महिलाओं वाले किरदार निभाए हैं। गोविंदा की आंटी नंबर वन और कमल की चची 420 पूरी तरह से ऐसे ही किरदार पर थी। आयुष्मान ने कहा भी उन्होंने गोविंदा से प्रेरणा ली है। राज कॉमेडी सर्कस और कॉमेडी नाईट कपिल के लिए लिखते रहे हैं। उन्होंने कई पुरुष कलाकारों को लड़कियां बनाया है। सुनील ग्रोवर का सबसे लोकप्रिय महिला किरार गुत्थी उनके ही कलम से जन्म ली है। जाहिर है कि वह इस तरह के किरदारों को गढ़ने में माहिर रहे हैं, इस वजह से भी उन्होंने अपनी पहली फिल्म का किरदार ऐसा चुना है। भारत में लौंडा नाच की परम्परा भी पुरानी है, जिसमें लड़के लड़कियां बन कर नाचते हैं। इन सब लिहाज से फिल्म का कांसेप्ट आकर्षित करता है। राज कॉमेडी में और अच्छे विषय के साथ आएंगे। ऐसी गुंजाईश दिखती है। मगर जरूरी है कि वह बे सिर पैर वाली सिर्फ मसाला फिल्मों की तरफ आकर्षित न हो जाएं तो।  

फिल्म में आयुष्मान ने बेहतरीन अदाकारी में कोई कमी नहीं छोड़ी है। वह वाकई इस ज़माने के अमोल पालेकर हैं। ऐसे विषयों पर उन्होंने महारथ हासिल की है। अच्छी बात यह रही है कि फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चयन भी निर्देशक ने सोच समझ कर किया है। विजय राज पुलिस कॉन्स्टेबल की भूमिका में जंचे हैं। निर्देशक ने उनके हास्य अंदाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया है। शायरी के शौक़ीन मजनू के रूप में उन्होंने जग जीत लिया है। अनु कपूर अपने चिर परिचित अंदाज़ में नजर आये हैं। अभिषेक बनर्जी ने अच्छा काम किया है। लेकिन फिल्म में सबसे बेहतरीन काम निधि विष्ट ने किया है। इंटरनेट दुनिया में छाने के बाद अब उन्हें फिल्मों में भी अच्छे मौके मिल रहे हैं। वहीं मनजोत को फुकरे के बाद इस फिल्म में अच्छा कमा करने का मौका मिला है। टोटो का किरदार निभाने वाले एक्टर भी दिलचस्प रहे हैं। फिल्म में नुसरत के हिस्से कम दृश्य आये हैं। लेकिन उन्होंने आयुष्मान को सपोर्ट किया है। फिल्म मनोरंजन के लिए देखी जानी चाहिए। लेकिन आयुष्मान की बाकी फिल्मों की तरह यह लम्बे समय तक याद रखे जाने वाली फिल्मों की फेहरिस्त में शायद ही शामिल हो। लेकिन यह भी सच है कि कलाकार को हक़ है कि वह हर का हिस्सा बने। उसे मसाला फिल्में करने का भी हक़ है। आयुष्मान की उस लिहाज से इस फिल्म में वह सब कुछ है।  

फिल्म : ड्रीम गर्ल 
कलाकार : आयुष्मान खुराना, नुशरत भरुचा, अनु कपूर, मनजोत सिंह, अभिषेक, विजय राज, निधि विष्ट 
निर्देशक : राज शांडिल्य 
समीक्षक ः अनुप्रिया वर्मा

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर -

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