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बाला मूवी रिव्यू : इन परफेक्शन को लेकर बनी पर्फेक्शनिस्ट फिल्म | नयी बॉलीवुड खबरे & Gossip

बाला मूवी रिव्यू : इन परफेक्शन को लेकर बनी पर्फेक्शनिस्ट फिल्म

By - दिपा बनसोडे

NOVEMBER 08,2019

आयुष्मान खुराना, यामी गौतम, भूमि पेडनेकर, सौरभ शुक्ला, सीमा पाहवा
छोटे शहरों में कहावत प्रचलित है। आदमी के पास कितना धन है, उसका अनुमान उसके सिर के बालों से लगाया जाता हैं। जितने कम बाल, आदमी उतना धनी। लेकिन अमर कौशिक की फिल्म बाला इस कहावत से बिल्कुल विपरीत चलती है। यहां वहीं धनी जिसके सिर पर बाल है। अमर की यह फिल्म सिर्फ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी नहीं है, जिसके सिर पर बाल नहीं है और वह गंजा है, बल्कि यह फिल्म पूरी तरह से उस समाज पर कटाक्ष है, जो किसी इंसान की खूबसूरती उसके अंग, आकार और रंग के आधार पर लगाते हैं। बड़े शहरों के लोगों के लिए यह आश्चर्यजनक बात हो सकती है, मगर छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऐसी कई महिलाएं हैं, जिनके नाम नहीं हैं। उन्हें मोटा, भैंसा, तो जिनका रंग काला है, उन्हें कलुठे, कोयेला की खान और न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाता है। जिसकी हाईट नहीं उन्हें नाटा, नतरा कहा जाता है। आज भी शादी के लिए इंटरनेट पर अपने लड़कों के लिए गोरी लड़की की ही तलाश होती है। आज भी पार्टियों में जाने पर दुल्हन की खूबसूरती उसके रंग पर ही आंकी जाती है। स्पष्ट है कि हमारे समाज में आज भी गोरा रंग होना ही सर्वोपरि है। इसके बावजूद कि हम जानते हैं कि भारत विभिन्न रंगों के लोगों का देश है।

बहरहाल, अमर कौशिक की बाला इस पूरे दृष्टिकोण को लड़के के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाती है। कानपूर में रहने वाले बाल मुकुंद उर्फ़ बाला (आयुष्मान खुराना), बचपन से बालों के धनी रहे हैं। वह खुद को मोहल्ले के शाहरुख़ खान समझता है। वह अपने स्कूल के टीजर, जो कि गंजे हैं लेकिन युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते ही बाला के बाल उड़ने लगते हैं। वह गंजा हो जाता है। कभी गलियों और स्कूल में रुआब झाड़ने वाला बाला अब बिना बालों वाला बन जाता है। वह इस दुःख में है, वह अपने आप से नजर नहीं मिलाना चाहता है। उसने अपने आईने को भी आधा ढंक दिया है कि उसे आईने में अपना गंजापन नजर न आये। उसके बचपन की गर्ल फ्रेंड उसको इसी कारण छोड़ चुकी है। वह दुनिया के तमाम नुस्खे अपना चुका है। लेकिन बाल उगाने में असमर्थ है। उसकी एक बचपन की दोस्त है लतिका (भूमि), जिसका रंग साफ नहीं है। बाला उसका भी मजाक बनाता है। लेकिन लतिका को खुद पर आत्मविश्वास है। उसे गोरे न होने का दुःख नहीं है। 

बाला जिस कम्पनी में काम करता है, वह गोरे बनाने वाली क्रीम की कम्पनी है, इसी कंपनी की फेस है - परी(यामी गौतम)। वह लखनऊ की टिक-टॉक क्वीन है। ऑफिस के काम के सिलिसले में ही बाला की मुलाकात परी से होती है। बचपन के प्रेम से दिल टूटने के बाद बाला की दिल की ख्वाहिश है कि उसे गोरी लड़की से ही शादी करनी है, जैसा कि भारत के 90 प्रतिशत लड़कों का होता है, भले ही उनमें सुर्खाब के पर न लगे हों, लेकिन बीवी के रूप में उन्हें गोरी परी ही चाहिए। बाला के पिता (सौरभ शुक्ला) ने बाला को विग गिफ्ट किया होता है, और कानपुर से लखनऊ जाते हुए उसे राय देते हैं कि इसे लगा ले। लोगों को ताकि यह भ्रम हो, लौटने के बाद कि तू इलाज करा कर लौटा है। बाला फिर से शाहरुख़ खान मोड में चला जाता है। टिक-टॉक क्वीन परी बाला के सेंस ऑफ ह्यूमर और उसके लुक से प्रभावित हो जाती है। दोनों शादी करने का निर्णय लेते हैं। लेकिन शादी के बाद परी के सामने बाला का सच आता है। इसके बाद कहानी में क्या मोड़ आते हैं। यही कहानी को दिलचस्प बनाते हैं।

एक तरफ जहाँ एक किरदार परी अपने गोर रंग को लेकर ओब्सेसेड है तो वहीं निर्देशक ने लतिका का कंट्रास्ट रखा है, जिसे काले होने का कोई गम नहीं है। फिल्म में निर्देशक ने एक अच्छा पक्ष यह भी रखा है कि अब तक की फिल्मों में लड़के लड़कियों की खामी कि वजह से उन्हें ठुकराते आते थे। इस बार लड़की को वह हक दिया है कि अगर वह खूबसूरत है तो उसे पूरा हक है कि वह अपने लिए सुंदर वर हासिल करें। फिल्म के ही एक दृश्य में मुख्य किरदार के पिताजी अपनी पत्नी को कहते हैं कि वह गंजे थे लेकिन बाला की मां ने उन्हें नहीं छोड़ा। यह दृश्य यह भी दर्शाता है कि पुराने जमाने में महिलाओं पर किस तरह पति थोप दिए जाते थे और वह ताउम्र उसे निभाया करती थीं। वहीं लतिका की मौसी, जिसके चेहरे पर मूंछ होने के कारण उनके पति द्वारा उन्हें छोड़ कर जाना यह दर्शाता है कि पुरुष तब भी वैसे ही थे, जिनके पास छोड़ने का हक हुआ करता था। अमर की यह फिल्म परतों में कई मुद्दों को छूती है और सामाजिक ढांचे के उस हिस्से पर प्रहार और कटाक्ष करती है, जो इंसान को इंसान नहीं कोई वस्तु समझता है और भेद करता है। यह फिल्म सिर्फ एक गंजे व्यक्ति की आपबीती की नहीं, बल्कि उस हर शक्स की कहानी है, जो खुद में कुछ खामी होने के कारण खुद को समाज में किसी अपंग से कम नहीं समझता। यह उस सोच पर प्रहार है।

फिल्म दम लगा के हैसा जैसी कई फिल्में हैं, जिसमें पुरुष द्वारा महिलाओं के शारीरिक बनावट का माखौल उड़ाया गया है। यह फिल्म महिला के दृष्टिकोण से है। निर्देशक की इसके लिए तारीफ होनी चाहिए। उन्होंने फिल्म की दोनों ही महिला पात्रों को काफी मजबूत और आत्म निर्भर बनाया है। परी और लतिका के रूप में। वह अपने हक के लिए कोर्ट तक पहुंचती है। फिल्म में कोर्ट रूम ड्रामा भी जबरदस्त क्रियेट किया गया है, जहां नायिका नायक को एहसास कराती है कि जब वह खुद अपने गंजेपन को लेकर हिचक रखता है तो वह उससे उम्मीद कैसे कर सकता कि वह उसे स्वीकारें।

निर्देशक ने कहानी में इतने खूबसूरत मोमेंट्स दिए हैं, जिससे न यह कहानी बेहद रोचक बनती है, बल्कि सन्देश देने के साथ-साथ पूरे तीन घंटे आपका मनोरंजन करती है। फिल्म की खूबसूरती न सिर्फ फिल्म की कहानी है, बल्कि फिल्म के किरदार, उनकी डिटेलिंग और मनोरंजक संवाद है। निर्देशक ने इसे सिर्फ कॉमेडी फिल्म बनाने की नीयत से नहीं बनाया है। वह इसमें एक पिता और बेटे के संबंध को भी दर्शाता है तो उस बचपन की दोस्त जिसे बचपन से काली होने के कारण पूरी दुनिया का उपहास सहना पड़ा है, दो दोस्त की कहानी को भी खूबसूरती से दर्शाया है। एक दृश्य में बेटा अपने गंजापन का पूरा दोष अपने पिता के जीन पर मढ़ता है, उसे खरी खोटी सुनाता है, जो कि खुद भी गंजे हैं। यह इस फिल्म के सबसे खूबसूरत दृश्यों में से एक हैं। 

आयुष्मान खुराना एक बार फिर इस फिल्म से साबित करते हैं कि फिलहाल ऐसे विषयों पर उनका सानी कोई नहीं है। हर फिल्म के साथ वह और निखर रहे हैं। लेकिन इस फिल्म में सबसे ज्यादा ध्यान खींचती हैं यामी। अबतक कि जितनी भी फिल्में उन्होंने की हैं। यह फिल्म उनकी बेस्ट फिल्म है। उन्होंने दृश्यों को ना सिर्फ हर दृश्य को रोचक बनाया है, बल्कि हर दृश्य में अपना योगदान दिया है। भूमि अपनी बाकी फिल्मों की तरह ही अपने किरदार में फिट बैठी हैं। उन्हें जितने भी दृश्य मिले हैं। उन्होंने प्रभाव शाली अभिनय किया है। लेकिन इस फिल्म में सह कलाकारों के अभिनय की तारीफ करना भी उतना ही लाजिमी है। चूंकि उन्होंने फिल्म में पूरी तरह कंट्रीब्यूट किया है। फिर चाहे बाला के नानाजी का किरदार निभाने वाले किरदार हों, या बाला के भाई का किरदार निभा रहे कलाकार हों। सौरभ शुक्ला और अभिषेक बनर्जी ने भी फिल्म में अद्भुत योगदान दिया है।

फिल्म एक अच्छा मैसेज देते हुए अपने निष्कर्ष पर पहुंचती है कि आखिर बदलना क्यों है। क्यों हम जिस तरह इस धरती पर आए हैं, उसके साथ नहीं जी सकते। क्यों परफेक्ट होना जरूरी है। फिल्म में चंद लाईनों में यह भी स्थापित करने की कोशिश की गई है कि भगवान ने ही ऊपर से यह भेद करके भेजा है। भगवान कृष्ण और कुपजा के संदर्भ का सटीक इस्तेमाल हुआ है। अमर ने स्त्री में भी कड़ा प्रहार किया था। एक अच्छे संदेश को कॉमेडी के अंदाज़ में पेश किया था और उसमें कामयाब रहें। इस बार भी वह अपने मकसद में कामयाब रहेंगे। फिल्म के संवाद कानपुर के स्थानीय माहौल का एहसास कराते हुए दर्शकों का खूब मनोरंजन करते हैं।

चलते चलते उजड़े चमन के निर्माता को एक सलाह केवल फिल्म के कंसेप्ट चुरा लेने भर से बढ़िया फिल्म नहीं बनती है। अब उन्हें यह फिल्म देख कर अफसोस जरूर होगा कि उन्होंने इस विषय को चुन कर कौताही ही की है।

फिल्म : बाला
कलाकार : आयुष्मान खुराना, यामी गौतम, भूमि पेडनेकर, सौरभ शुक्ला, सीमा पाहवा
निर्देशक : अमर कौशिक
प्रोड्यूसर : दिनेश विजन
समीक्षक : अनुप्रिया वर्मा

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर -

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